लेख

संस्मरण : बाल्यावस्था की स्मृतियों में झांकता रुपहला संसार

राजीव कुमार झा मेरे दादा एक परंपरानिष्ठ ब्राह्मण थे और खेती बाड़ी का काम उन्हें कभी पसंद नहीं आया . पुरोहिताई के काम में भी उन्हें आडंबर पसंद नहीं था इसलिए वे पूजापाठ के काम से उनसे यथोचित धनार्जन नहीं हो पाया . मेरे पिता जब पचीस साल के थे तभी उनका देहांत हो गया […]

राष्ट्रीय लेख

किसान आंदोलनः प्रतिष्ठा का प्रश्न क्यों?

रमन शर्मा कृषि कानूनों के खिलाफ 17 दिनों से जारी किसानों का आंदोलन अब केन्द्र सरकार और किसान, दोनों के लिये प्रतिष्ठा की लड़ाई बना नजर आने लगा है। जहां किसानों ने सरकार के प्रस्ताव नकार कर अपना आंदोलन तेज करने का ऐलान कर दिया, वहीं केन्द्र सरकार भी झुकने को तैयार नहीं। किसान चाहते […]

लेख

ताज प्रदेश की मांग तेज, नए प्रदेश की जरूरत क्यों ?

डा. सुरेंद्र सिंह देश के सबसे बड़े सूबे उत्तर प्रदेश में पिछले तीन साल से एक मांग चल रही है ‘ताज प्रदेश’ की। आखिर यह क्या मांग है, यह क्यों जरूरी है? इसे लेकर अक्सर लोगों के जेहन में सवाल उठते रहते हैं, कुछ लोग मजाक भी उड़ाते हैं इतना छोटा प्रदेश कैसे बन सकता […]

लेख

व्यंग्य: जब लौट के बुद्धु घर को आए, जनाब

– डाॅ. (इंजी.) आलोक सक्सेना जी जनाब, जब से संस्कृत का पंडित बना हूं तभी से मेरा सात्विकता और आराम में बहुत विश्वास बन गया है। लॉकडाउन के दौरान दिन में भी सो जाने का मौका मिला और मैं सोफे पर ही सो गया। जैसे ही मैं नींद में गया तो सपनदेव आ गए। समझाने लगे,-‘वत्स, चलो लौट के बुद्धु घर को आए। कोरोना वायरस विश्वव्यापी महामारी बन कर जरूर आया मगर उसने भारत की वसुधैव कुटंबमक की परंपरा को अंगे्रजी पसंद, हिंदी को अपमानित समझने वालों को भी समझा दिया कि कितनी बड़ी शक्ति है हमारी ‘नमस्ते’ करने की परंपरा। जो प्रेम के साथ-साथ संक्रमण के द्वार भी बंद करती है। अंगे्रजी पसंद लोग अक्सर यही समझते रहे कि जो बात ‘हैलो हाय’ और ‘गाल-से-गाल’ मिलाने में है वह बात ‘नमस्ते  जी’ और ‘पैर छूने’ में कहां। यहां तक कि अपने देश में नमस्ते और पवाले को अशिक्षित समझा जाने लगा था। और तो और पैर छूने वाले को चापलूस तक समझा जाने लगा कि जरूर ही इसका कोई काम होगा तभी पैर छूकर चापलूसी कर रहा है। कुछ तो बड़ी ही हेय की दृष्टि से भी देखते थे। अब फिर नमस्ते करने के फायदे पहचाने हैं। आगे अर्द्ध नग्न होकर घुमने वाले युवक और युवतियों को भारतीय परंपरागत तन ढ़कने वाले संस्कारी भारतीय परिधान पहनाने वाला भी कोई आ सकता है। मेरी नजर में तो वह और कोई नहीं बल्कि सर्वशक्तिमान परमपिता परमात्मा यानी स्वयं […]