साहित्य खबर

स्वतंत्रता आंदोलन के केंद्र चंपारण के मोतिहारी पर प्रकाश डालती पुस्तक

प्रो.(डॉ.) अरुण कुमार
चंपारण के प्रखर पत्रकार और इलेक्ट्रॉनिक मीडिया के विषेशज्ञ विद्वान डॉ.कुमार कौस्तुभ द्वारा संपादित पुस्तक ‘चंपारण में मोतिहारी एक खोज’ एक ऐसी खोज है जिसके माध्यम से भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन के नाभिकीय केंद्र चंपारण के मोतिहारी पर विशेषज्ञ विद्वानों द्वारा बड़े ढंग से प्रकाश डाला गया है। इसके विषय सूची के व्यापक आयाम और विविधता यह सिद्ध करती है कि पुस्तक की मौलिकता और सार्थकता के पीछे गहन संपादकीय दृष्टि का हाथ रहा है जिससे यह पुस्तक अत्यंत रोचक, ज्ञानवर्धक और पठनीय बन पड़ी है।
पूरी पुस्तक को विवेचन सुविधा की दृष्टि से पांच भागों में विभक्त करते हुए सबसे पहले”मोतिहारी की खोज क्यों?”जैसे उठनेवाले प्रश्न का सुंदर भावन किया गया है।इस संदर्भ में संपादक का कहना है मानना है कि सत्याग्रह की प्रथम भूमि होने का श्रेय इतिहास में चंपारण को अवश्य मिला परन्तु सत्याग्रह की प्रथम प्रयोगभूमि मोतिहारी ही रही।


चंपारण पर लिखने वालों ने मोतिहारी को उतना नहीं उभारा जितने का यह शहर हकदार है।विदित हो कि महात्मा गांधी ने मोतिहारी के अनुमंडल न्यायालय में ही’ सत्य के प्रति आग्रह’ और ‘सविनय अवज्ञा’ जैसे ब्रह्मास्त्रों का आविष्कार किया था जिससे भारत को स्वतंत्रता मिली।
पुस्तक के प्रथम भाग में मोतिहारी का स्वर्णिम इतिहास,भव्य भूगोल, सक्रिय राजनीति, शिक्षा जगत, उद्योग धंधे, चंपारण सत्याग्रह, मोतिहारी के मुहल्ले टोले, मिलेनियम राइटर जॉर्ज ऑरवेल की जन्मस्थली, खेल जगत, समाजसेवी स्वैच्छिक संस्थाएं, मीना बाज़ार, चिकित्सा व्यवस्था तथा मोतीझील पर गहन विमर्श प्रस्तुत किया गया है। दूसरे भाग में मोतिहारी के साहित्य, संस्कृति और पत्रकारिता को केंद्र में रखते हुए अतीत से वर्तमान तक के साहित्य और संस्कृति के अनमोल तत्वों की तलाश की गई है। सांस्कृतिक दृष्टि से उत्तर बिहार की सांस्कृतिक राजधानी कहलाने वाले शहर मोतिहारी की सांस्कृतिक संस्थाओं पर भी गंभीर विमर्श प्रस्तुत किया गया है।
तीसरे भाग के अंतर्गत मोतिहारी के अज़ीम शख्सियतों पर प्रकाश डालते हुए शहर के चतुर्दिक विकास में उनके स्मरणीय योगदान को रेखांकित किया गया है। पुस्तक का चतुर्थ खंड मोतिहारी के आसपास के इलाकों पर केंद्रित है जिसमें बेतिया,बगहा, वाल्मीकि नगर, सुगौली, रक्सौल, अरेराज,केसरिया, मेहसी,चकिया, बरहड़वा लखन सेन, भीतिहरवा, सीताकुंड, चंद्रहिया गांधी आश्रम, विश्व कबीर शांति स्तम्भ, बेलवतिया आदि कस्बों की ऐतिहासिक, राजनीतिक एवं सांस्कृतिक पड़ताल की गई है। ये सारे के सारे स्थल सीता परिपथ,बौद्ध परिपथ,पांडव परिपथ और गांधी परिपथ के विभिन्न जीवंत स्तम्भ हैं,इसमें किंचित संदेह नहीं।
पुस्तक का पांचवां और अंतिम भाग मोतिहारी की यादों को समर्पित है जिसके माध्यम से लेखकों ने इस शहर में गुजारे गए अनमोल लम्हों को शब्दों में गूंथ कर प्रस्तुत करने का स्तुत्य प्रयास किया है जो कि अत्यंत रोचक बन पड़ा है।यह कहने में कोई अत्युक्ति नहीं, कि उत्तर बिहार का सीमावर्ती शहर मोतिहारी खूबसूरत मोतीझील के दर्पण में जब अपना अक्स ढूंढता है तब उसकी पृष्ठभूमि में एक सुदीर्घ संपन्न परम्परा झांकती हुई दिखती है।
एक स्वर्णिम विरासत जा भी चित्र उभरता है।विद्वान संपादक ने पुस्तक की परिकल्पना इन्हीं तत्वों को ढूंढने के लिए की है और उसे अपेक्षित सफलता भी मिली है।अपनी माटी की पावन सुगंध को ढूंढना,महसूस करना और उसे औरों तक बिखेरना एक सकारात्मक कार्य है जिसके लिए संपादक को शतशः बधाई!
पुस्तक का शब्द संयोजन, मुद्रण और साज सज्जा सुंदर और आकर्षक है जिसके लिए इसके प्रकाशक और मुद्रक को बधाई!कहना न होगा कि पुस्तक का सबसे महत्वपूर्ण पक्ष उसकी पाठकीयता होती है और यह पुस्तक पठनीयता की दृष्टि से भी वैविध्यपूर्ण और रोचक बन पड़ी है।चंपारण और मोतिहारी पर शोध कार्य करनेवालों के लिए भी यह पुस्तक अत्यंत उपयोगी सिद्ध होगी,ऐसा मेरा दृढ़ विश्वास है।
एक जिल्द में,एक स्थान पर इतने विपुल और बहुविध तथ्यों की प्रस्तुति मोतिहारी का अध्ययन करने वालों के लिए एक बौद्घिक संपदा सिद्ध होगी इसमें कोई संदेह नहीं।
(हिन्दी विभागाध्यक्ष, स्नातकोत्तर हिंदी विभाग,एम. एस.कॉलेज,मोतिहारी)

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