लेख

व्यंग्य: जब लौट के बुद्धु घर को आए, जनाब

– डाॅ. (इंजी.) आलोक सक्सेना

जी जनाब, जब से संस्कृत का पंडित बना हूं तभी से मेरा सात्विकता और आराम में बहुत विश्वास बन गया है। लॉकडाउन के दौरान दिन में भी सो जाने का मौका मिला और मैं सोफे पर ही सो गया। जैसे ही मैं नींद में गया तो सपनदेव आ गए। समझाने लगे,-‘वत्स, चलो लौट के बुद्धु घर को आए। कोरोना वायरस विश्वव्यापी महामारी बन कर जरूर आया मगर उसने भारत की वसुधैव कुटंबमक की परंपरा को अंगे्रजी पसंद, हिंदी को अपमानित समझने वालों को भी समझा दिया कि कितनी बड़ी शक्ति है हमारी ‘नमस्ते’ करने की परंपरा। जो प्रेम के साथ-साथ संक्रमण के द्वार भी बंद करती है। अंगे्रजी पसंद लोग अक्सर यही समझते रहे कि जो बात ‘हैलो हाय’ और ‘गाल-से-गाल’ मिलाने में है वह बात ‘नमस्ते  जी’ और ‘पैर छूने’ में कहां। यहां तक कि अपने देश में नमस्ते और पवाले को अशिक्षित समझा जाने लगा था। और तो और पैर छूने वाले को चापलूस तक समझा जाने लगा कि जरूर ही इसका कोई काम होगा तभी पैर छूकर चापलूसी कर रहा है। कुछ तो बड़ी ही हेय की दृष्टि से भी देखते थे। अब फिर नमस्ते करने के फायदे पहचाने हैं। आगे अर्द्ध नग्न होकर घुमने वाले युवक और युवतियों को भारतीय परंपरागत तन ढ़कने वाले संस्कारी भारतीय परिधान पहनाने वाला भी कोई आ सकता है। मेरी नजर में तो वह और कोई नहीं बल्कि सर्वशक्तिमान परमपिता परमात्मा यानी स्वयं भगवान होंगे। और लोगों को पवित्रता और सतयुगी चल-चलन सिखाएंगे ।’ 

हमने कहा,- ‘कैसे?’, वह बोले,- ‘भगवद्गीता के अनुसार लोग भगवान को बुलाते हैं कि हे पतित पावन आओ और आकर हमको पावन बनाओ। तो वो कब आएगा? संभवतः इसी समय जब विश्वभर की आत्माएं घोर कलियुग के काल में ग्रसित हो कर त्राहि-त्राहि मचा रही होंगी। तभी आएगा, ना। और सतयुग स्थापित करेगा।’

हमने फिर सपने में ही बड़बड़ाते हुए कहा,-‘सर, छोड़िए विनाश और सतुयग की स्थापना की बातों को कुछ और सुनाईए।’ वह बोले,-‘सुनाईए क्या। देखते नहीं चारों तरफ कोरोना का रोना ही रोना चल रहा है। बाजारों में दाल-चावल कम। मास्क और सेनेटाइजर ज्यादा बिक रहे हैं।  लोगों की मौत को बचाने के लिए लॉकडाउन के बाबजूद भी भई कालाबाज़ारी का धंधा  जोरों पर चला ।’

हमने कहा,-‘जी, जीवनदायनी वस्तुओं की  कालाबाज़ारी  कभी  नहीं होनी चाहिए। जो हो रहा था बिल्कुल गलत था । वैसे मौका लगता है तो आदमी लालच कर  ही जाता है ।  इसमें भगवान भी आ जाएं तो भी क्या ।’

सपनदेव फिर भगवद्गीता पर आ गए और बोले,- ‘बंधु, गीता के अनुसार परमेश्वर ने कहा है कि अपने द्वारा अपना संसार समुद्र से उद्धार करें और अपने को अधोगति में न डालें, क्योंकि यह मनुष्यात्मा आप ही अपने मित्र हैं और आप ही अपने शत्रु ।’

तभी मेरे सोफे के पास रखे  मोबाइल पर आए व्हाट्स ऐप की पुप्प …  पुप्प … ने मुझे नींद से जगा दिया। शाम हो चुकी थी और मेरा मोबाइल ढेरों व्हाट्स ऐप  संदेशों से भर चुका  था। संदेश देखना शुरू किए तो उसमें कोरोना से बचने के लिए अंग्रेजी लोग ‘लात से लात’ मिला कर एक दूसरे का अभिनंदन कर रहे थे। कुछ घनिष्ट मित्र ‘कोहनी से कोहनी’ मिला रहे थे।’  मुझे समझ आ चुका था कि हरफनमौला लोग तो हरफनगिरी का रास्ता किसी न किसी तरीके से निकाल ही लेते हैं। उनके लिए तो हर हाल में खिलखिलाना ही जीवन होता है चाहें कोरोना आए या कोई दूसरा रोना। और हमारे सपनदेव इस मौके पर योग की महिमा कर रहे थे। तो वह भी सही कह रहे थे कि कोरोना का क्या रोना। सावधानी के साथ हर हाल में खुश रहना सीखना चाहिए।

केसर-बादमयुक्त एक गिलास गरम दूध पीकर मैं रात्रि में शयन कक्ष में घुसा तो पत्नी अपने पलंग को मेरे पलंग से 1 मीटर दूर सरका कर गहन निद्रा में जा चुकीं थीं । और कुछ बड़बड़ा रहीं थीं, इन्द्रियाणां हि चरतां यन्मनोनुविधीते…… । आगे मैं तुरंत समझ गया कि यहां भी भगवान गुप्तरूप से पवित्रता स्थापन हेतु ज्ञान दे रहे हैं और सात्विक रहने की कला सिखा रहे हैं। संस्कृत का पंडित होने के नाते मैं यह भी समझ गया कि भगवन विशेषरूप से इन्हें समझा रहे हैं कि विचरणशील इन्द्रियों में से कोई एक जिस पर मन निरंतर लगा रहता है, मनुष्य की बुद्धि को हर लेती है। इसलिए रसोई में जाकर मैंने तुरंत एक गिलास ठंडा जल पीकर अपनी प्यास बुझाई और वापस शयन कक्ष में आकर अपनी सिंगिल चादर तान कर सो गया। 

(लेखक प्रयोगधर्मी व्यंग्यकार हैं) 

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