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क्रिटिकल केस सुलझाने में फोर्टिस को महारत हासिल, तीन साल की नशरा को दिया नया जीवन

नई दिल्‍ली। दुर्लभ बीमारी और क्रिटिकल केस सुलझाने में फोर्टिस अस्पताल का कोई जोड़ नही है। कई बिगड़े केसों को सुधार कर लोगों को जीवन देने में फोर्टिस अस्पताल कई बार कीर्तमान स्थापित कर चुका है। इस बार शालीमार फोर्टिस अस्पताल के डॉक्टरों ने हेमोफैगोसाइटिक लिम्फोहिस्टोसाइटोसिस नाम की बीमारी से उबार कर बच्ची को नई जिन्दगी दी है। यह आनुवांशिक रूप से होने वाली दुर्लभ ऑटो-इम्यून बीमारी है।

हाल ही में तीन वर्ष की मरीज़ नाशरा खान को इलाज के लिए फोर्टिस अस्पताल शालीमार बाग लाया गया। पूरी जांच से पता चला कि उसको हेमोफैगोसाइटिक लिम्फोहिस्टोसाइटोसिस नाम की बीमारी है। इसमें नाशरा के बचने की केवल पांच प्रतिशत उम्मीद थी। उनके इलाज के लिए मल्टीडिसप्लनेरी एप्रोच अपनाई गई।  इस गंभीर बीमारी से पीड़ित नशरा का डॉक्टर राहुल भार्गव (डायरेक्टर और हेड, बल्ड डिसॉर्डर, हेमाटोलॉजी आईमेडिकल ऑन्कोलॉजी, हेमेटोलॉजी और बीएमटी) और डॉक्टर अमृता चक्रवर्ती (एसोसिएट कंसल्टेंट, हेमाटोलॉजी एंड बोन मैरो ट्रांसप्लांट) के नेतृत्व में इलाज किया गया।

नशरा जब अस्पताल पहुंची तो उसको बुखार, दस्त और पेट में सूजन की समस्या थी। मरीज़ की मेडिकल हिस्ट्री से पता चला कि उसके बड़े भाई-बहनों को भी यही समस्या हुई थी, जिसके बाद उनकी मौत हो गई थी। तुरंत मरीज़ के ख़ून की जांच, स्कैन और बोन मैरो टेस्ट किया गया और जांच से फैमिलिया एचएलएच होने की पुष्टि हुई। मरीज़ के जीन में एसटीएक्सबीपीटू नाम का बहुत ही दुर्लभ म्यूटेशन हुआ था, जिससे फैमिलिया एचएलएच नाम की दुर्लभ आनुवांशिक बीमारी की पुष्टि करने में मदद मिली।

इस संबंध में डॉ. भार्गव ने बताया कि हमने कीमोथेरेपी के साथ नशरा का इलाज शुरू किया। जिससे मरीज़ के अतिसक्रिय, असामान्य और ख़ुद को नुकसान पहुंचाने वाले इम्यून सिस्टम को नियंत्रित किया जा सके। हमने एचएलएच प्रोटोकॉल94 को अपनाया और इलाज का शुरुआती दौर पूरा होने के बाद हमने हाफ-मैच्ड बोन मैरो ट्रांसप्लांट (जिसे हाप्लोआईडेंटिकल स्टेम सेल ट्रांसप्लांट भी कहा जाता है) किया। उनके पिता ने अपनी स्टेम कोशिकाएं दान दीं। टेरोसुल्फान, फ्लुडरबाइन और टीबीआई कंडीशनिंग के ज़रिए नशरा का इलाज करने के बाद स्टेम सैल ट्रांसप्लांट किया गया।”

डॉ. चक्रवर्ती ने बताया कि “नशरा ट्रांसप्लांट के 3 महीने बाद तक गंभीर रूप से बीमार रही। उसके शरीर में कई समस्याएं पैदा हुई जैसे एक्यूट स्किन एंड गट ग्राफ्ट बनाम होस्ट डिजीज, ऐसी स्थिति जिसके कारण पूरी त्वचा, भोजन नली की परत, पेट और आंतों में भयानक छाले हो जाते हैं। उसे साइटोमेगालोवायरस का संक्रमण भी हुआ। एक वायरल संक्रमण जिसके कारण बोन मैरो सही तरह से काम नहीं करता और ख़ून का स्तर नीचे चला जाता है। साथ ही उसे पॉस्टिरीएर रिवर्सेबल एन्सेफैलोपैथी सिंड्रोम की परेशानी भी हुई, जिसके कारण उसे बार-बार दौरे पड़े।”

डॉ भार्गव ने बताया, “हमने बच्चे को बचाने के लिए हरसंभव कोशिश की। स्टेरॉयड, इम्यूनोमॉड्यूलेटरी ड्रग्स, इम्युनोग्लोबुलिन, एंटीबायोटिक्स और बार-बार ब्लड ट्रांस्फ्यूशन के ज़रिए उसका इलाज किया गया। आखिरकार, उसकी स्थिति में धीरे-धीरे सुधार होने लगा और ब्ल़ड ट्रांस्फ्यूशन करने की ज़रूरत खत्म हो गई। उसका बोन मैरो ट्रांसप्लांट सफल रहा क्योंकि उसकी काइमेरिज्म रिपोर्ट से पता चला था कि उसका बोन मैरो अब दानदाता की तरह की सौ प्रतिशन स्वस्थ कोशिकाओं का निर्माण कर रहा था। अब उसका बोन मैरो ट्रांसप्लांट हुए डेढ़ साल से ज़्यादा का समय हो गया है और मुझे यह कहते हुए खुशी हो रही है कि नाशरा पूरी तरह से ठीक हो गई है।”

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