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किडनी व लीवर की दुर्लभ बीमारी से ग्रस्त बच्‍ची को फोर्टिस अस्‍पताल ने दिया जीवनदान

प्रवीन कुमार
नई दिल्ली। फोर्टिस अस्‍पताल, शालीमार बाग के डॉक्‍टरों की एक टीम ने हाल में एक 6 वर्षीय बच्‍चे नया जीवनदान दिया। मरीज़ किडनी के एक दुर्लभ किस्‍म के जन्‍मजात विकार के अलावा मैलिगनेंट लीवर की बीमारी से ग्रस्त था। यह मरीज़ हीपेटोब्‍लास्‍टोमा से ग्रस्‍त थी जो कि समूचे दक्षिण एशियाई क्षेत्र में काफी दुर्लभ है। उपचार सफल रहा व बच्‍चा अब बचपन का आनंद ले रहा है।
फोर्टिस अस्‍पताल, शालीमार बाग में इस टीम का नेतृत्‍व डॉ प्रदीप जैन, डायरेक्‍टर, जीआई ओंकोसर्जरी ने किया। इस बच्‍चे को पेट में लगातार दर्द की शिकायत रहती थी, जिसकी वजह से वह स्‍कूल और खेलने भी नहीं जा पाता था। जांच करने पर डॉक्‍टरों ने पाया कि उसके लीवर के दायीं ओर एक बड़ी कैंसर ग्रोथ थी। इसके अलावा, उसकी दायीं किडनी में एक जन्‍मजात ब्‍लॉकेज भी थी जिससे किडनी में सूजन आ गयी थी और वह बेकार हो चुकी थी। जांच के बाद इलाज की पूरी योजना तैयार की गई। लीवर के दायीं ओर स्थित कैंसर की गांठ और दायीं किडनी को निकाल दिया गया। यह काफी सावधानी से किया गया जिससे मरीज़ का शेष लीवर सुरक्षित बचा रह सके। ऑपरेशन के बाद मरीज़ को कीमोथेरेपी की कोई जरूरत नहीं हुई और न ही कैंसर के दोबारा उभरने के कोई लक्षण दिखायी दिए हैं। इस चुनौतीपूर्ण सर्जरी के बारे में डॉ प्रदीप जैन ने बताया कि जब हमने पहली बार इस बच्‍ची की जांच की थी तो उसकी स्थिति काफी खतरनाक थी। मरीज़ की उम्र को देखते हुए इस दुर्लभ स्थिति से सावधानीपूर्वक निपटा गया। इतनी कम उम्र के मरीज़ के लिए वाकई एक बड़ा ऑपरेशन था। डॉ. जैन ने बताया कि हमने अपने विकल्‍पों पर काफी सावधानीपूर्वक विचार किया और किडनी को निकालने का फैसला किया। इसके बाद लीवर के मध्‍यवर्ती सैगमेंटों को भी हटाया गया। 5 घंटे चले ऑपरेशन के बाद उसकी स्थिति में काफी सुधार हो रहा है। फोर्टिस अस्‍पताल के जोनल डायरेक्‍टर महिपाल भनोत ने बताया कि यह बेहद जटिल किस्‍म की सर्जरी थी। और हमें यूनिटों के विशेषज्ञों तथा एनेस्‍थीटिस्‍टों के बीच भरपूर तालमेल रखकर एक बच्‍चे के बहुमूल्‍य जीवन को बचाना था।
उल्लेखनीय है कि हीपेटोब्‍लास्‍टोमा अत्‍यधिक दुर्लभ किस्‍म का मैलिग्‍नेंट लीवर कैंसर है, जो शिशुओं और बच्‍चों में पाया जाता है। बाल्‍यावस्‍था में कैंसर के मामले दुनियाभर में पिछले 20 वर्षों में 13 प्रतिशत बढ़ चुके हैं और दुनियाभर में 0 से 4 वर्ष के प्रति 10 लाख में 140 बच्‍चे हर साल इसका शिकार बनते हैं।

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